Banke Bihari Temple Vrindavan History in Hindi बांके बिहारी मंदिर वृंदावन, इतिहास, कहानी, रहस्य , मान्यता

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श्रीधाम वृंदावन एक पावन भूमि है, श्री बांके बिहारी मंदिर वृंदावन में स्थापित श्री बांके बिहारीजी की प्रतिमा , स्वामी हरिदास जी को स्वयं दिव्य युगल श्यामा-श्याम द्वारा प्रदान की गई है। यहाँ भगवान राधा रानी के साथ भव्य रूप में प्रकट हुए एवं आकर्षक छवि छोड़ गए।

स्वामी हरिदास जी का इतिहास

स्वामी हरिदास जी का जन्म श्री आशुधीर और गंगादेवी के यहाँ राधा अष्टमी के दिन वर्ष 1535 के भाद्रपद मास के दूसरे पखवाड़े के आठवें दिन हुआ था। उस जगह का नाम यू पी में अलीगढ़ के पास हरिदासपुर है । श्री गर्गाचार्य यादवों के कुलगुरु थे और श्री वासुदेव के अनुरोध पर कृष्ण और बलराम के नामकरण संस्कार के संचालन के लिए गुप्त रूप से बृज का दौरा किया। परिवार की एक शाखा मुल्तान चली गई, लेकिन उनमें से कुछ लंबे समय के बाद लौट आए। श्री आशुधीर एक ऐसे प्रवासी थे, जो मुल्तान से लौटने के बाद अलीगढ़ के पास बृज के बाहरी इलाके में बस गए। हरिदासजी ललिता ‘सखी’ के अवतार थे ।बचपन में ही उनका विवाह हो गया था। हरिरिदास शादी के बाद भी सांसारिक सुखों से दूर रहे । हरिदासजी की पत्नी हरिमती जी स्वयं ऐसी संत आत्मा थीं कि अपने पति के झुकाव को भांपकर उन्होंने गहन प्रार्थना की और हरिदास की उपस्थिति में एक छोटे से दीपक की लौ में प्रवेश करके उन्हें शारीरिक रूप से भगवान के स्वर्गलोक में पहुँचाया ।

हरिदासजी ने अपना गाँव छोड़ दिया, और व्रन्दावन के निधिवन में आबसे। संगीत का अभ्यास करने और ध्यान का शाश्वत आनंद लेने के लिए। उन्होंने वृंदावन में नित्य बिहार का निरंतर ध्यान किया। उनकी साधना का तरीका भगवान की स्तुति में गीत लिखना और गाना था। 

Banke Bihari Mandir Vrindavan

बांके बिहारी मंदिर वृंदावन इतिहास व कहानी

हरिदासजी के शिष्यों को इस जगह के बारे में जानने की उत्सुकता थी और एक दिन स्वामी जी की अनुमति से वे सभी कुंज में प्रवेश कर गए। लेकिन कुछ भी देखने के बजाय वे लगभग उज्ज्वल, तीव्र प्रकाश से अंधे हो गए थे,उनकी दुर्दशा को जानकर स्वामीजी स्वयं वहां गए, और फिर उनके अनुरोध के बाद, भगवान दिव्य रूप में मुस्कुराते हुए और एक चंचल मनोदशा में प्रकट हुए और वहां मौजूद प्रत्येक जीव पर आकर्षण का जादू डाला। जिन लोगों ने यह देखा, वे भगवान और उनकी पत्नी की सुंदरता से इतने मंत्रमुग्ध थे कि वे अपनी आँखें भी नहीं झपका सकते थे, ऐसा लगता था कि वे सभी पत्थर की मूर्तियों में बदल गए थे।

बांके बिहारी मंदिर व निधिवन

गोस्वामी की पीढि़यों को बताई गई कथा कहती है कि निधिवन मन्दिर मे दिव्य दंपत्ति की सुंदरता ऐसी थी कि कोई भी दिव्यता की दृष्टि और निकटता को खोना नहीं चाहता था, दिव्य जोड़े की सुंदरता इतनी अधिक थी कि आप और मेरे जैसे कमनश्वर लोग इस तरह के स्वर्गीय सौंदर्य को सहन नहीं कर पाएंगे। यह भांपकर स्वामी हरिदासजी ने उन दोनों से एक ही रूप धारण करने का अनुरोध किया, उन्होंने उनसे घन और दामिनी जैसा एक ही रूप लेने का अनुरोध किया, और वरदान मांगा की आप उसकी आंखों के सामने निधिवन मे रहे। उनकी दोनों इच्छाओं को पूरा करते हुए, भगवान जी ने खुद को एक काले रंग की आकर्षक मूर्ति में बदल दिया, वही जिसे आप आज मंदिर में देखते हैं।

बांके बिहारी जी को पर्दे में क्यों रखा जाता है?

श्री बांके बिहारी जी का आकर्षण और सौन्दर्य ही एकमात्र कारण है कि मंदिर में ‘दर्शन’ कभी भी निरन्तर नही होते उन्हें पर्दे से ढक दिया जाता है । यह भी कहा जाता है कि यदि कोई श्री बांके बिहारी जी की आंखों में काफी देर तक देखता है, तो व्यक्ति अपनी चेतना खो देता है।

इस तरह भगवान श्रीबांके बिहारीजी का भौतिक रूप अस्तित्व में आया, जिन्हें बिहारीजी के नाम से जाना जाता है. बिहारीजी की सेवा की जिम्मेदारी स्वामी जी ने स्वयं गोस्वामी जगन्नाथ को सौंपी थी। गोस्वामी जगन्नाथ स्वामीजी के प्रमुख शिष्य और छोटे भाई में से एक थे। उसी परंपरा के अनुसार, बिहारी जी की सेवा जगन्नाथ गोस्वामी के वंशजों द्वारा की जाती है।

बांके बिहारीजी के मंदिर का निर्माण कब हुआ

1862 ई. में बिहारीजी की महिमा के अनुरूप एक नए मंदिर का निर्माण किया गया । गोस्वामी ने स्वयं निर्माण के लिए संसाधन जुटाए। मंदिर बहुत ही सुंदर ब अनोखा बना हुआ है ।

बिहारी जी की सेवा अपने आप में अनूठी है। जैसे कि श्रृंगार, राजभोग और शयन। जबकि श्रृंगार और भोग  की पेशकश की जाती है, शाम को शयन सेवा की जाती है। मंदिर में मंगला मतलब सुबह सेवा की परंपरा नहीं है। 

 मंदिर आज अपनी पूरी महिमा के साथ खड़ा है, जिसके अंदर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण निवास करते हैं। यहां रोजाना हजारों की संख्या में भक्तों का आना जाना रहता है । Book Your Train Package

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